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उनके दो नैनन

कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को।  गर वो चूमे मेरा माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। वो रहनुम है मेरा जिसने गुलज़ार किया है मेरे आंगन को। छू कर बदन मेरा, एक नया मंजिल दिया है इस मुसाफ़िर को। हर सांस में अब बस एक नाम है, अगर वो दे -  दे इजाजत तो "जोगन बन फिरूँ" और रेटते रहूं उनके नामो को। कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को। गर वो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। सुनी हूँ हर जर्रे पर खुदा बसता है।  मेरा उनके कदमों में जहां बसता है,हो जाए अगर खुदा भी नाराज तो कोई मलाल नहीं होगा, गर वह कह दे एक बार तो मैं सजदा करूं बस उनको और ढाक लूं अपने इन नैनन को। अगर वो जो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। - राधा माही सिंह