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पता नहीं क्यों....???!! मगर आज पहली बार सब कुछ अपने आँखों के सामने जाते देख मैं रो नहीं रही थी। आज जो मैं बोली हूँ, वो शायद मैं नहीं थी। मैं इतना कुछ कैसे बोल सकती हूँ। मुझमें इतनी हिम्मत कहा से आ रही है? मैं वो कुछ बोल पा रही हूँ,जो मुझे बुरा लगा था या लगता था। अब मुझे रोना नहीं आता क्योंकि मैं लड़ना सीख ली हूँ। जो कल तक किसी कमरे के कौने में दुबक कर रोने लग जाती थी वो आज बेबाकी से अपनी बातों को रख रही थी। सच कहा गया है, इंसान को किताबें जो चीज़ नहीं सिखा पाता उसे चोट लगने पर समझ आ जाता है। अब मुझे समझ आ गया है कि मुझे क्या करना है। मूझे क्या चाहिए। मैं अब वो ही करूंगी। और आशा करती हूँ आप भी वो ही करो। जो आप चाहते हो जो आपका दिल चाहता है।

भाग 1

डियर गर्ल्स...!! अपने अस्तित्व बचाने के प्रयास में अपने सपनों के साथ समझौता मत कर देना। आप से अस्तित्व है अस्तित्व से आप शायद हो सकते है। मैने कहा शायद!!!! आप अपने आप के लिए जीवन शुरू कर दो। ये समाज और समाज के ठेकेदार कभी आपको सही नज़रों से देखेंगे ही नहीं क्योंकि इनकी नीयत पहले से ही त्य किया हुआ है। वो आपको किसी वस्तु की तरह देखते है, उनके अनुसार जिसका मोल बाजार में पहले से ही त्य किया जा चुका है । डियर गर्ल्स...!!! आपके आस पास भी कई ऐसी औरतें या कई ऐसे लोग होंगे जो आपको आपको बनने से रोकती है। क्योंकि उनको डर है कि कही आप उनसे बेहतर न बन जाओ। वो डरती है कि आप उनसे आगे न निकल जाओ। वो डरती है कि कही आप उनसे जोड़ा ताकतवर न बन जाओ। डियर गर्ल्स....!! ये बात याद रखना तुम्हे तुम्हारी जंग खुद लड़नी होगी। खुदको कही प्रूफ करने से पहले, खुदके लिए जीना सीखना होगा। तुम्हे जो करना है। जैसे रहना है, तुम रहना। डियर गर्ल्स....!!! अगर तुम्हारे पर्स टांग लेने से तुम चरित्र हीन बन जाती हो तो हाँ हो तुम चरित्र हीन यह उपलब्धि को भी स्वीकार करो मैने किया है। अगर तुम्हें तुम्हारे संघर्षों के कारण जानने के बा...
ठहर कर कुछ देर ही सही, अपने सफ़र को जी लिया कर, ऐ मुसाफ़िर, हर रास्ता ख़ूबसूरत हो, ये ज़रूरी नहीं होता। कुछ देर ही सही, उनकी क़ुर्बत में गुज़ारा करो, हर कोई तुम्हारी तरह ख़ुशनसीब नहीं होता। मैंने कहीं पढ़ा था— आने वाले हर रास्ते का मोड़ एक जैसा नहीं होता। थोड़ा ठहर कर, कुछ देर ही सही, अपने सफ़र को जी लिया कर, ऐ मुसाफ़िर, आने वाला हर रास्ता ख़ूबसूरत नहीं होता। तुम्हें हर बात पर जल्दी है जाने की, तुम्हें क्यों ठहरना नहीं आता?
जाकी भजन राम को भावे, जाकी भजन श्याम को भावे। जे मन में मोर मीत बसे, कुहू-कुहू के संगीत बसे। जो मन तोरा, सो मन मोरा, मन में न कोई बैर बसे। जे मन में श्रीराम बसे, जे मन में घनश्याम बसे। जाकी गति सो होवे नाथ, जै लिखी हो दीनानाथ। हमरो हाथ पकड़ लिजो प्रभु, भवसागर से पार की जो प्रभु। बैतरणी से तरी जो प्रभु। डूबत नैया थाम लि जो प्रभु। जस मन व्याकुल होय हमारो तस तोहे गाऊ मोरे नाथ। कर दिजो बस एको उपकर कर दे जो ई भवसागर को पार। जस मन चिंतन मिटी हो हमारा। जे नाम गोसाई सुनी गोहर। जाकी भजन राम को भावे, जाकी भजन श्याम को भावे। जे मन में मोर मीत बसे, कुहू-कुहू के संगीत बसे। राम भी मोरे, श्याम भी मोरे, मोरे मन के प्रीतम दोऊ। एक में जग सारा देखूँ, दोऊ में मोरी दुनिया होऊ। जाकी भजन राम को भावे। जाकी भजन श्याम को भावे।
प्रेम वैराग्य! वैराग्य स्थिरता ! स्थिरता शीतलता! शीतलता प्यास! प्यास नीर! नीर चंचलता! चंचलता स्वभाव! स्वभाव क्षणिक! क्षणिक मनुष्य! मनुष्य माया! माया प्रेम! अर्थात् जीवन एक चक्र है आप शुरू जहां कही से भी करो अंततः आपको पहचुनां वही है जहाँ से आपने प्रारंभ किया था।
या खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया यह सवाल मेरे मन में अवतार उम्र रहेगी तू रहेगी बेशक मेरे जहां में अब मगर भरोसा है अंदाज अब शायद ही वफा में होगी या खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया यह सवाल तुझे अबता उम्र रहेगी.... मैं करूंगी सजदा तेरा ना मेरे ईमान में कमी होगा.... मगर अब जब भी सजदा करूंगी तो मेरे सवाल में कहीं ना कहीं एतराम होगा हर दफा हर मर्तबा मेरे जहां में सवाल होगा ए खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया... क्यों तूने जरा सा भी मेरे ऊपर दरिया दिल ही नहीं दिखाई क्यों तूने मुझे मेरा पसंदीदा शख्स छीना या खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया क्या कमी रह गया था मेरे इबादत में मैंने तो उसे खुद नहीं किया फिर तूने उसे क्यों मुझे नहीं दिया या खुदा मेरे किस बात का तूने यह सजा दिया या खुदा मेरे तूने बताइए क्या किया यह जो तुम जुल्म मुझ पर ढा रहे हो यह जो सितम मुझ पर बरसा रहे हो या खुदा मेरे तुम कभी तो मुझ पर तरस खाओ कभी तो मेरे इन दस्तों को पकड़ कर कह दो कि मैं तेरे आगोश में कर रख दूं तू कर थोड़ा सा मुझ पर करम कर तू मुझ पर थोड़ा सा रहें या खुदा मेरे क्या कमी थी मेरे इबादत ...
घर के सुख-चैन को त्याग कर बेटा अफसर बनने चला था। पिता भी खूब इठलाया और पूरे गाँव में ढिंढोरा पीट कर कहा था। " अब बनेगा मेरा बेटा अफसर शहर में जा के।" कई दशक बीत गए, अब बेटा आएगा घर को, जब हांडी ठन-ठनाई, तब बेटा रहा दुबक के। बेटे ने काटी खूब अय्याशी बाप के पैसे पर बढ़-चढ़ के। अब रहा ताकता वो दिन भर अपने घर के अटारी पर चढ़ के। कोई तो हाथ लगे, कोई तो बात बने, कोई तो रह जाए मेरे कारण पछता के। कैसे कोई पंक्षी उड़े उसके घर के अटारी पे आ के?! मैं पंक्षी के पंखों को काटूंगा और वो रह जाएगा छटपटा के। बेटे को कहां भनक था सब देख रहा है ऊपर वाला भी इसको टक लगा के।      - राधा माही सिंह