घर के सुख-चैन को त्याग कर बेटा अफसर बनने चला था। पिता भी खूब इठलाया और पूरे गाँव में ढिंढोरा पीट कर कहा था। " अब बनेगा मेरा बेटा अफसर शहर में जा के।" कई दशक बीत गए, अब बेटा आएगा घर को, जब हांडी ठन-ठनाई, तब बेटा रहा दुबक के। बेटे ने काटी खूब अय्याशी बाप के पैसे पर बढ़-चढ़ के। अब रहा ताकता वो दिन भर अपने घर के अटारी पर चढ़ के। कोई तो हाथ लगे, कोई तो बात बने, कोई तो रह जाए मेरे कारण पछता के। कैसे कोई पंक्षी उड़े उसके घर के अटारी पे आ के?! मैं पंक्षी के पंखों को काटूंगा और वो रह जाएगा छटपटा के। बेटे को कहां भनक था सब देख रहा है ऊपर वाला भी इसको टक लगा के। - राधा माही सिंह
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किल्लत
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कोई मेरी समस्या का निवारण बताइए, बिना खाए कैसे गुजारा करें, कोई उपाय बताइए। खाना बनाते समय गैस कैसे बचाएँ, इसका भी कोई रास्ता समझाइए। हम तो जोड़ लेते थे रूम रेंट और किताबों का हिसाब, अब कैसे दें 400 रुपये गैस के, इस उलझन की कोई गुत्थी सुलझाइए। क्या हम लौट जाएँ बिना मंज़िल पाए घर को, सिर्फ इसलिए कि इस बार न पेपर लीक हुआ, न प्रश्नपत्र में सवाल गलत थे। इस बार तो बस मेरे जीवन की समस्या का कोई हल ही नहीं था — कोई मुझे घर लौटने का कारण बताइए। यह कालाबाज़ारी हम मध्यमवर्गीयों को नोच रही है, कोई इसका भी निवारण बताइए। जब गैस की इतनी किल्लत है, तो कोई समाधान निकालिए। हम खाली पेट कैसे सोएँ, कोई इस समस्या का निवारण बताइए। - राधा माही सिंह
हैपी होली
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अब वो स्कूल वाली होली कहाँ रही? अब गुजिया में वो मिठास कहाँ रही? अब गुलाल से ज़्यादा रिश्तों में ही रंग घुलने लगे हैं, अब त्योहारों में वो पहली-सी सौगात कहाँ रही? न वो बेफिक्री की हँसी के ठहाके कहा रही? न वो दोस्त संग रंगों की शरारत भरी वो दिन है और न वो उम्र वाली बात रही। जाने क्यों अब यादों के दर्पण मुझको खुदके ओर खींचते है... सब कुछ तो है.... फिर भी कुछ कमी - सी लगती है, वो बचपन की पिचकारी अंकल आंटी वाली प्रेम की थाली यारो के संग बांटे गए वो रंगों का वो सफेद समय अब वैसे कोई इबारत कहां रही? जीवन ने बहुत से रंग बदले,पर मन को आज भी वही रंग चाहिए जब हाथों में मेरे थे रंग बिरंगे रंग और पिचकारी का वो धार, छत से मारते गुब्बारों का ढेर घर में गूंजती किलकारियों का शोर,मगर अब वो पहले जैसे बात कहा रही? अब पहले जैसी त्यौहार कहां रही?
तू बोले तो
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एक तू बोले तो तेरी खुशियों के खातिर हम वैश्या भी बन सकते है। एक तू बोले तो तेरे खातिर इस ज़माने से भी लड़ सकते है। इसका-उसका,किंतु-परंतु सब छोड़ो दे तू बस एक तू बोले तो हम तेरे हो सकते है। हीरा-मोती, महल-अटारी नहीं चाहिए मुझको एक तू बोले तो हम तेरे प्रेम में जोगन हो सकते है। एक तू बोले तो हम तेरी खुशियों के खातिर हम तेरे कदमों में चूम सकते है। एक तू बोले तो तेरे खातिर मीनारों का सुख छोड़ तेरे पास दौड़े आ सकते है। एक तू बोले तेरे खातिर हम वैश्या भी बन सकते है। - राधा माही सिंह
पूर्व प्रेमीका
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मुझे कोई राह बता दो कोई मुझे उस पार करा दो। है उसका जहां ठिकाना मुझे कोई तो उस जगह पहुंचा दो। मैंने उसे मयखाने में भी ढूंढा है, वो वहां भी अब नहीं रहता! कोई तो मुझे उसके "पूर्व प्रेमीका" का पता दो। अच्छा छोड़ो...!!? वो कैसा है कम से कम कोई यही बता दो? क्या उसे मेरी बेख्याली नहीं खाती? क्या उसे मेरी याद नहीं आती? क्या उसे मेरी तन्हाई नज़र नहीं आती? कोई उसे मेरा ही हाल बता दो। मैं ढूंढ रही हूँ "दर- बदर" कोई तो उस तक यह बात पहुँचा दो। वो कहा है,कैसा है,कोई तो बता दो। - राधा माही सिंह
रानी
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कमरे में अब धूल जम चुका है। किताबों के जगह कुछ अरमानों ने ले लिया है। सपना अब दम तोड़ चुका है। शीत लहर ने अब आस को जगाना छोड़ दिया है। पिंजरे के ताला अब हमेशा के लिए बंद हो चुका है। रानी को था यकीन उसका राजकुमार आएगा और उसे इस जहां से बचा कर कहीं दूर तलक ले जाएगा, फिर समझ आया की तालाब से दूर तलक नहीं जाया जा सकता है यह यकीन मेंढकों को हो चुका है। कंधा भले ही किसी का मिले मगर लोग जाता ही देते हैं यह बात बस सुना ही था आज रानी देख चुकी है। यकीन था उसे आसमानों में उड़ने का, मगर आसमानों में कुछ बाज अब अपना घर बन चुके हैं। रानी फिर से एक बार पंखों को काट चुकी है। रानी फिर से एक बार चलन से पहले,दौड़ने से पहले,डगमगाने से पहले हताश होकर बैठ चुकी है। माँ ने झूठ कहा था कि रानी झुकती नहीं है, कि रानी कभी रुकती नहीं है। अब रानी ठहर चुकी है के,हमेशा हमेशा के लिए खुद में कैद हो चुकी है, अब रानी बिखर चुकी है, थम चुकी हैं। कोई गैर नहीं है उसे तोड़ने वाला कोई अपना ही था जो उसे मार चुका है अंदर ही अंदर उसे खा चुका है कोई बेख्याली बदहवासी उसे खत्म कर चुका है अब रान...
उनके दो नैनन
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कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को। गर वो चूमे मेरा माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। वो रहनुम है मेरा जिसने गुलज़ार किया है मेरे आंगन को। छू कर बदन मेरा, एक नया मंजिल दिया है इस मुसाफ़िर को। हर सांस में अब बस एक नाम है, अगर वो दे - दे इजाजत तो "जोगन बन फिरूँ" और रेटते रहूं उनके नामो को। कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को। गर वो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। सुनी हूँ हर जर्रे पर खुदा बसता है। मेरा उनके कदमों में जहां बसता है,हो जाए अगर खुदा भी नाराज तो कोई मलाल नहीं होगा, गर वह कह दे एक बार तो मैं सजदा करूं बस उनको और ढाक लूं अपने इन नैनन को। अगर वो जो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। - राधा माही सिंह