रानी
कमरे में अब धूल जम चुका है।
किताबों के जगह कुछ अरमानों ने ले लिया है।
सपना अब दम तोड़ चुका है।
शीत लहर ने अब आस को जगाना छोड़ दिया है।
पिंजरे के ताला अब हमेशा के लिए बंद हो चुका है।
रानी को था यकीन उसका राजकुमार आएगा और उसे इस जहां से बचा कर कहीं दूर तलक ले जाएगा, फिर समझ आया की तालाब से दूर तलक नहीं जाया जा सकता है यह यकीन मेंढकों को हो चुका है।
कंधा भले ही किसी का मिले मगर लोग जाता ही देते हैं यह बात बस सुना ही था आज रानी देख चुकी है।
यकीन था उसे आसमानों में उड़ने का, मगर आसमानों में कुछ बाज अब अपना घर बन चुके हैं।
रानी फिर से एक बार पंखों को काट चुकी है।
रानी फिर से एक बार चलन से पहले,दौड़ने से पहले,डगमगाने से पहले हताश होकर बैठ चुकी है।
माँ ने झूठ कहा था कि रानी झुकती नहीं है, कि रानी कभी रुकती नहीं है।
अब रानी ठहर चुकी है के,हमेशा हमेशा के लिए खुद में कैद हो चुकी है, अब रानी बिखर चुकी है, थम चुकी हैं।
कोई गैर नहीं है उसे तोड़ने वाला कोई अपना ही था जो उसे मार चुका है अंदर ही अंदर उसे खा चुका है कोई बेख्याली बदहवासी उसे खत्म कर चुका है अब रानी मर चुकी है।
- Radha maahi Singh
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