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Showing posts from March, 2026

किल्लत

कोई मेरी समस्या का निवारण बताइए, बिना खाए कैसे गुजारा करें, कोई उपाय बताइए। खाना बनाते समय गैस कैसे बचाएँ, इसका भी कोई रास्ता समझाइए। हम तो जोड़ लेते थे रूम रेंट और किताबों का हिसाब, अब कैसे दें 400 रुपये गैस के, इस उलझन की कोई गुत्थी सुलझाइए। क्या हम लौट जाएँ बिना मंज़िल पाए घर को, सिर्फ इसलिए कि इस बार न पेपर लीक हुआ, न प्रश्नपत्र में सवाल गलत थे। इस बार तो बस मेरे जीवन की समस्या का कोई हल ही नहीं था — कोई मुझे घर लौटने का कारण बताइए। यह कालाबाज़ारी हम मध्यमवर्गीयों को नोच रही है, कोई इसका भी निवारण बताइए। जब गैस की इतनी किल्लत है, तो कोई समाधान निकालिए। हम खाली पेट कैसे सोएँ, कोई इस समस्या का निवारण बताइए। - राधा माही सिंह 

हैपी होली

अब वो स्कूल वाली होली कहाँ रही? अब गुजिया में वो मिठास कहाँ रही? अब गुलाल से ज़्यादा रिश्तों में ही रंग घुलने लगे हैं, अब त्योहारों में वो पहली-सी सौगात कहाँ रही? न वो बेफिक्री की हँसी के ठहाके कहा रही? न वो दोस्त संग रंगों की शरारत भरी वो दिन है और न वो उम्र वाली बात रही। जाने क्यों अब यादों के दर्पण मुझको खुदके ओर खींचते है... सब कुछ तो है.... फिर भी कुछ कमी - सी लगती है, वो बचपन की पिचकारी अंकल आंटी वाली प्रेम की थाली यारो के संग बांटे गए वो रंगों का वो सफेद समय अब वैसे कोई इबारत कहां रही? जीवन ने बहुत से रंग बदले,पर मन को आज भी वही रंग चाहिए जब हाथों में मेरे थे रंग बिरंगे रंग और पिचकारी का वो धार, छत से मारते गुब्बारों का ढेर घर में गूंजती किलकारियों का शोर,मगर अब वो पहले जैसे बात कहा रही? अब पहले जैसी त्यौहार कहां रही?