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हैपी होली

अब वो स्कूल वाली होली कहाँ रही? अब गुजिया में वो मिठास कहाँ रही? अब गुलाल से ज़्यादा रिश्तों में ही रंग घुलने लगे हैं, अब त्योहारों में वो पहली-सी सौगात कहाँ रही? न वो बेफिक्री की हँसी के ठहाके कहा रही? न वो दोस्त संग रंगों की शरारत भरी वो दिन है और न वो उम्र वाली बात रही। जाने क्यों अब यादों के दर्पण मुझको खुदके ओर खींचते है... सब कुछ तो है.... फिर भी कुछ कमी - सी लगती है, वो बचपन की पिचकारी अंकल आंटी वाली प्रेम की थाली यारो के संग बांटे गए वो रंगों का वो सफेद समय अब वैसे कोई इबारत कहां रही? जीवन ने बहुत से रंग बदले,पर मन को आज भी वही रंग चाहिए जब हाथों में मेरे थे रंग बिरंगे रंग और पिचकारी का वो धार, छत से मारते गुब्बारों का ढेर घर में गूंजती किलकारियों का शोर,मगर अब वो पहले जैसे बात कहा रही? अब पहले जैसी त्यौहार कहां रही?