बहुत दिनो बाद एक खेल याद आई है।
फिर से मेरी बचपन की सहेलिया याद आई हैं। चॉक्लेट देने वाले अंकल भी देखो पास बुलाए है।
आज फिर से गुड़ा-गुड़िया का विवहा याद आई है।
-राधा माही सिंह
कोई मेरी समस्या का निवारण बताइए, बिना खाए कैसे गुजारा करें, कोई उपाय बताइए। खाना बनाते समय गैस कैसे बचाएँ, इसका भी कोई रास्ता समझाइए। हम तो जोड़ लेते थे रूम रेंट और किताबों का हिसाब, अब कैसे दें 400 रुपये गैस के, इस उलझन की कोई गुत्थी सुलझाइए। क्या हम लौट जाएँ बिना मंज़िल पाए घर को, सिर्फ इसलिए कि इस बार न पेपर लीक हुआ, न प्रश्नपत्र में सवाल गलत थे। इस बार तो बस मेरे जीवन की समस्या का कोई हल ही नहीं था — कोई मुझे घर लौटने का कारण बताइए। यह कालाबाज़ारी हम मध्यमवर्गीयों को नोच रही है, कोई इसका भी निवारण बताइए। जब गैस की इतनी किल्लत है, तो कोई समाधान निकालिए। हम खाली पेट कैसे सोएँ, कोई इस समस्या का निवारण बताइए। - राधा माही सिंह
हम सब तुम्हारे साथ है। यह कह कर ही तो दरवाजे से उस दरवाजे तक ले जाया जाता था। माँ-बाप,भाई-बहन,चाचा-चाची से ले कर ईश्वर तक से पहचान कराई जाती थी। चलते-चलते गिर जाने पर धरती माँ को भी मार खानी पड़ती थी। ममता है इसलिए एक हाथो में मेरी बचपन तो दूसरी हाथो में घर की ज़िम्मेदारीयो उठानी पड़ती थी। है... उम्र नही गुज़रा अभी। मगर सीखी बहुत कुछ हूँ! प्रेम में छिपे स्वार्थ को,अपनों के चहरों में पराए रिश्तेदार को। ना जाने किसने कहा था? कि...........!!! बिता हुआ वक़्त कभी लौटता नही है। मैं हर रोज़ घड़ियाँ देखा करती हूँ। कल भी 12 बजा उतने ही समय पर था जितना कि बीते हुए कल में बज था। बरहाल माज़रा यह नही था कि उस समय-समय क्या था? माज़रा कुछ ऐसा था कि अपनो का मंजर था। महफिलों में जामो पर जाम लगाई जा रही थी। यारो के साथ कश लगाई गई थी। अब ये वो वक़्त है कि ना वो अपने है और ना वो यार है। बस अब सभी मतलब के तलबगार है। आज खुदको उस हाल में महसूस कर रही हूँ। जब बंद मुठ्ठी करके इस जहाँ में आई थी। तब माँ ने मेरे माथे को चूम कर कहा था। हम सब तुम्हारे साथ है।
किसी ने मुझसे पूछा, सुकून क्या है? मैंने कहा, उसका मुस्कुराना। किसी ने मुझसे पूछा, शर्म क्या है? मैंने कहा, उसका मुझसे यूं नज़रों को चुराना। किसी ने मुझसे पूछा, तड़प क्या है? मैंने कहा, उसका मुझसे वादा कर के ना मिलने आना। किसी ने मुझसे पूछा, शिद्दत क्या है? मैंने कहा, मेरा उससे एकतरफा दिल लगाना। किसी ने मुझसे पूछा, मौत क्या है? मैंने कहा, उसका मुझसे रूठ जाना। किसी ने मुझसे पूछा, फिर जज़्बात क्या हैं? मैंने कहा, मेरा उससे लिपटकर रोना और जो कभी पूरे ना हो सकें, उन ख्वाबों को बुनना। -राधा माही सिंह
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