ऐ ज़िंदगी, तू मुझे कहीं दूर ले चल, जहाँ बस मैं और तू ही रहें। ले चल मुझे उस फ़िज़ा में, जहाँ किसी की कोई तलब न रहे। गर मैं रहूँ ख़ामोश, तो तुम मेरे शब्दों से समझ जाना, मैं कहूँ बहुत कुछ, तो तु मेरी गहराईयों को छू लेना। ऐ ज़िंदगी, अब हम तुम्हारे ही मोहताज़ हैं, सबने सहारे छिना हैं। तिनके-तिनके के लिए तड़पी हूँ। तू ले चल मुझे वहाँ, जहाँ तेरे आगोश में सर रखकर कुछ पल सुकून का सो सकूँ, और इस जहाँ को एतराज़ भी न हो। जहाँ मैं कह सकूँ, तू सुन सके, मैं रो सकूँ, तू हँसा सके, कोई बंदिश न हो, कोई हमें झुठला न सके। ऐ ज़िंदगी, तू मिलना किसी मुसाफ़िर की तरह, जो मैं कहूँ और तू न जा सके। मैं बाँधू तुझे अपने डोर से, तू सिसक सके, मैं बिलख सकूँ। मैं रूठ सकूँ, तू मना सके, बस यूँ ही चलता रहे ये सिलसिला। तू ले चल मुझे वहाँ, जहाँ कोई और ना जा सके। - राधा माही सिंह
कोई मेरी समस्या का निवारण बताइए, बिना खाए कैसे गुजारा करें, कोई उपाय बताइए। खाना बनाते समय गैस कैसे बचाएँ, इसका भी कोई रास्ता समझाइए। हम तो जोड़ लेते थे रूम रेंट और किताबों का हिसाब, अब कैसे दें 400 रुपये गैस के, इस उलझन की कोई गुत्थी सुलझाइए। क्या हम लौट जाएँ बिना मंज़िल पाए घर को, सिर्फ इसलिए कि इस बार न पेपर लीक हुआ, न प्रश्नपत्र में सवाल गलत थे। इस बार तो बस मेरे जीवन की समस्या का कोई हल ही नहीं था — कोई मुझे घर लौटने का कारण बताइए। यह कालाबाज़ारी हम मध्यमवर्गीयों को नोच रही है, कोई इसका भी निवारण बताइए। जब गैस की इतनी किल्लत है, तो कोई समाधान निकालिए। हम खाली पेट कैसे सोएँ, कोई इस समस्या का निवारण बताइए। - राधा माही सिंह
यूं आजमाइश करो ना हमारी हर बात पर, हम पहले से ही आजमाए गए हैं। क्या-क्या बताएं और क्या-क्या छुपाएं तुमसे? जमाने भर की ठोकरें हम खाए हुए हैं। यूं छेड़ो ना कोई राग अब तुम, कि दामन में दाग लगाए हुए हैं। कि यूं चोला ना पहना करो मेरे महबूब का तुम, हम उनसे भी आजमाए गए हैं। बे शर्त जीने का ख़्वाब था आंखों में, और प्रेम का उल्लास लिए दफनाए गए है। यूं ना बर्बाद करो हमको, हम पहले से बरबादी के शहर में खो गए है। यूं ना ज़लील कर तू मुझे जमाने में,हम पहले से ही खुदको - खुदके नज़रों से गिराए हुए है। तुम क्या जानो मेरी रातों का नींद और सुबह का चैन, हम तो सब कुछ एक शख्स के पूछे गवाए हुए है। - राधा माही सिंह
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