घर के सुख-चैन को त्याग कर बेटा अफसर बनने चला था।
पिता भी खूब इठलाया और पूरे गाँव में ढिंढोरा पीट कर कहा था।
" अब बनेगा मेरा बेटा अफसर शहर में जा के।"
कई दशक बीत गए, अब बेटा आएगा घर को,
जब हांडी ठन-ठनाई, तब बेटा रहा दुबक के।
बेटे ने काटी खूब अय्याशी बाप के पैसे पर बढ़-चढ़ के।
अब रहा ताकता वो दिन भर अपने घर के अटारी पर चढ़ के।
कोई तो हाथ लगे, कोई तो बात बने,
कोई तो रह जाए मेरे कारण पछता के।
कैसे कोई पंक्षी उड़े उसके घर के अटारी पे आ के?!
मैं पंक्षी के पंखों को काटूंगा और वो रह जाएगा छटपटा के।
बेटे को कहां भनक था सब देख रहा है ऊपर वाला भी इसको टक लगा के।
     - राधा माही सिंह

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