जाकी भजन राम को भावे,
जाकी भजन श्याम को भावे।
जे मन में मोर मीत बसे,
कुहू-कुहू के संगीत बसे।
जो मन तोरा, सो मन मोरा,
मन में न कोई बैर बसे।
जे मन में श्रीराम बसे,
जे मन में घनश्याम बसे।
जाकी गति सो होवे नाथ,
जै लिखी हो दीनानाथ।
हमरो हाथ पकड़ लिजो प्रभु,
भवसागर से पार की जो प्रभु।
बैतरणी से तरी जो प्रभु।
डूबत नैया थाम लि जो प्रभु।
जस मन व्याकुल होय हमारो तस तोहे गाऊ मोरे नाथ।
कर दिजो बस एको उपकर कर दे जो ई भवसागर को पार।
जस मन चिंतन मिटी हो हमारा।
जे नाम गोसाई सुनी गोहर।
जाकी भजन राम को भावे,
जाकी भजन श्याम को भावे।
जे मन में मोर मीत बसे,
कुहू-कुहू के संगीत बसे।
राम भी मोरे, श्याम भी मोरे,
मोरे मन के प्रीतम दोऊ।
एक में जग सारा देखूँ,
दोऊ में मोरी दुनिया होऊ।
जाकी भजन राम को भावे।
जाकी भजन श्याम को भावे।
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