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एक दौर

एक दौर यह भी रहा ज़िंदगी में। जहां टूट जाने पर लोगो ने लूट लिया। एक दौर यह भी रहा ज़िंदगी में। जहां अपनों की हर बात कड़वी और दूसरो की चापलूसी मीठी लगी। एक दौर यह भी रहा ज़िंदगी में। जहां रिश्ते हमने पैसों से कई बना लिया,मगर मां - बाप  बना नही सका। एक दौर यह भी रहा जिंदगी में। जहां डिग्रिया तो बहुत कमाई। मगर किस्मत अजमा लिया,और डिग्रिया पड़ी रह गई। एक दौर यह भी रहा ज़िंदगी में। जहां झूठ जीत गया और सच मोन रहा, और सबने "मुझे" गुनहागर भी मान लिया। एक दौर यह भी रहा ज़िंदगी में। उतार चढ़ाओ बहुत देखे और सुना भी हमने। मगर खुदको हर जगह से नाकामयाब होते भी देख लिया। एक दौर यह भी रहा ज़िंदगी में। सब कुछ चुप-चाप सहना सीखा लिया।                 - राधा माही सिंह 

कुछ ना मेरा।

ना घर मेरा। ना द्वार मेरा। ना संसार मेरा। मां ने बोला पराए घर को जाना है। मैने भी मान लिया चलो वो ही सही वो घर मेरा। जब गई उस घर को,उस घर ने कहा पराई घर से आई हूं। मैने यह भी मान लिया चलो पराई ही सही भला आई ही तो हूं। ना प्यार मेरा। ना घर में कोई दीवार मेरा। संसार में बस एक अबला पहचान मिला। पिता ने हाथ जब भी थामा,उन्होंने सिखाया संस्कार मेरा। जब पति ने थामा हाथ मेरा उठा दिया चरित्र पर दाग़ मेरा! ना घर मेरा। ना द्वार मेरा। मैने एक बनाई भी आशियाना। बच्चे पूछते क्या काम मेरा? मैं संभल कर रही,कुछ रिश्तों को संभालते रही। बहन ने दे दिया मतलबी का खिताब मेरा। ना पति मेरा। ना पिता मेरा। ना मां का स्नेह मेरा। जब घर बाटा पिता,ने बस रह गया कुछ चौथाई मेरा। जहां शायद आज भी मेरे बचपन के कुछ तस्वीरे लटके हो सकते है! ना हद मेरा। ना बेहद मेरा। ना कोई रंग मेरा। ना छांव मेरा। मैं मोह में डूबी ममता मेरा। ना गजरा मेरा। ना सुरमा मेरा। मैं व्रत भी करू और वह वर्त का फल भी ना हो सका मेरा। ना संसार मेरा। ना मोह मेरा। गहनों की ढेर में रह गया बस जज़्बात मेरा। ना पद मेरा। ना अधिकार मेरा। हम सब के हो कर रह गए। मगर क...

कभी कभी

कभी-कभी ना एक दम से हार जाती हूँ। कभी खुद से तो कभी अपनी ही हालातो से। कभी कभी तो समझ में नहीं आता की लडू किस से? खुद के ही जज्बातों से? या खुद में खुट रही सैलाबो से? कभी-कभी ना एक दम से हार जाती हूँ। कभी-कभी तो समझ में नहीं आता लडू किस से ? खुद के सवालों से? या खुद के ही ख्वाबों के तरानों से? या फिर महंगे ख्वाब लिए आंखो के धारों से? कभी- कभी ना मन घबरा सा जाता है। समझ में नहीं आता की लिखूं खुद को क्या? जी लूं वो बेपाक बचपना? या सिख लूं हस कर हर दुःख को छुपाना? या फिर छोड़ दूं किसी से यह उम्मीद  रखना। कि वो इज्जत से बोलेगा। कोई ना लगे रहो! मंजिले नहीं मिली तो क्या? अनुभव को जुगाड़ती जाओ। सपने देखने भर से क्या? हुआ पूरा तो थी। वरना वो ख्वाब ही क्या? कभी-कभी एक दम से हार जाती हूंँ। कभी खुदको तो कभी हालातों से उलझ कर ही रह जाती हूँ।            - राधा माही सिंह

उलझन

कैसे बताऊं अब उनको? कि, किस उलझनों में हम उलझे है। अब कहना छोड़ दिया है, हमने कौन कैसा ? और कैसा भीतर रंग का है।  कैसे बताऊं अब उनको? कि, हमने अपनो को बदलते देखा है। अब कहना छोड़ दिया है,हमने कौन किसका कितना है? भला कैसे कहूं, यहां हर कोई बहता सागर सा है। कैसे बताऊं अब उनको? कि,किस उलझनों में हम उलझे है।       - राधा माही सिंह

रिश्ते

मेरे पिता जी अक्सर कहा करते है। जब बात रिश्तों की हो तो वहा हमेशा झुक जाना ही उच्चित है। मगर अब भला रिश्तों में क्या उच्चित और क्या अनुचित है? बस-अब एक बोझ सा लगा होता है सामने वाले पर की जाने सामने वाला किस बात पर आप से दृष्ट हो जाए? लोग लहजे और लिहाज की फिकर नही करते। अब रिश्ते भी उनके कपड़ों की  पसंद जैसे है। बेहतर और बेहतरीन की किसको पड़ी है? भला ये वक्त में साथ है कल तो चले ही जाना है। रिश्तों की किन्हें पड़ी है? बस यहां सभी मतलब के तलब गार है। "ईद,बकरीद, होली दिवाली" यहां तक की चैत्र, भादो सब आता है। गर मजाल हो इन पर "मन"अकेला आया हो! देखना तो सब को अपना - अपना ही है। फिर जाने क्यों,कोई रिश्तेदार है? मेरे पिता कहते है। रिश्ते से बड़ा ना कोई संसार है। रिश्तों में ही प्यार है। प्रेम का दूसरा नाम ही परिवार है। अब तब से मेरे मन में एक भेद छुपा है। परिवार का मतलब सिर्फ खून वाला हिस्सा नही। जरूरी है,मन को भी मिलना। मगर यह माना सिर्फ मेरे पिता की है। हमने अभी संसार देखना है।              - राधा माही सिंह

क्यों

क्यों सवाल उठाते है लोग? जाने क्यों खुदको चरित्रवान बताते है लोग? क्यों एक लड़का एक लड़की दोस्त नही बन सकती? क्यों किसी और के ज़िन्दगी में तक झाक करना जानते है लोग? क्यों सवाल उठाते है लोग? जाने क्या - क्या छुपाते है लोग? श्री कृष्ण को भी नही बक्शा गया। मां सीता को भी अग्नि परीक्षा देना पड़ा। हर बार स्त्री को ही क्यों घीना का पत्र बनते है लोग? एक सवाल है मेरा। क्यों हर बार लड़कियों को ही "चरित्र" से लरस्ते है लोग? क्यों किसी रिश्ते का होना आवश्यक है किसी धागे में बढ़ना जरूरी है। क्यों ये छोटी बात को नही समझ पाते है लोग ? क्यों लडको को "चरित्रहीनता" का सुध बुध नही देते है लोग? क्यों सवालों पर भी लड़का लड़की होने का भेद रखते है लोग?                   -राधा माही सिंह

हर रोज

हर रोज रातों की मेरी "बर्बादियो" का एक "मंजर"लगता है।  जाने क्यों ये शामें मुझे तुम्हारी यादों की समंदर लगता है। तो कभी मैं डूब कर तुम्हें तराशती हूं, इन समन्दर की गहराइयों में। मगर फिर भी ना जाने क्यों सब कुछ अधूरा ख़ाब सा लगता है? हर रोज सुबह मेरी "तसल्ली" वाली होती है।  जाने फिर क्यों ये राते मेरी "बेमंतजर"  सी सोती है। मेरे पास में कभी कुछ "खोने" को था ही नही। मगर जाने ये "दिल" अब हर रोज "क्या" खोने से डरता है? "इल्म"अब मुझे बस सिर्फ इतना है! कि अब ये ज़िन्दगी घायल परिंदे जितना है।  जाने कब "तसव्वुर" मिलेगी "इल्लाही"इस दिल को?  कि बस अब इंतेजार "घड़ी"भर की  है। हर रोज निकलती है,मेरी खुशियों का जनाजा। "खुदा" खुद ही मेरा "नमाजे जनाजा"  पढ़ने को आता है।              -राधा माही सिंह