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पूर्व प्रेमीका

मुझे कोई राह बता दो कोई मुझे उस पार करा दो। है उसका जहां ठिकाना मुझे कोई तो उस जगह पहुंचा दो। मैंने उसे मयखाने में भी ढूंढा है, वो वहां भी अब नहीं रहता!  कोई तो मुझे उसके "पूर्व प्रेमीका"  का पता दो। अच्छा छोड़ो...!!? वो कैसा है कम से कम कोई यही बता दो? क्या उसे मेरी बेख्याली नहीं खाती? क्या उसे मेरी याद नहीं आती?  क्या उसे मेरी तन्हाई नज़र नहीं आती? कोई उसे मेरा ही हाल बता दो। मैं ढूंढ रही हूँ "दर- बदर" कोई तो उस तक यह बात पहुँचा दो। वो कहा  है,कैसा है,कोई तो बता दो। - राधा माही सिंह 

रानी

कमरे में अब धूल जम चुका है।  किताबों के जगह कुछ अरमानों ने ले लिया है।  सपना अब दम तोड़ चुका है।  शीत लहर ने अब आस को जगाना छोड़ दिया है।  पिंजरे के ताला अब हमेशा के लिए बंद हो चुका है।  रानी को था यकीन उसका राजकुमार आएगा और उसे इस जहां से बचा कर कहीं दूर तलक ले जाएगा, फिर समझ आया की तालाब से दूर तलक नहीं जाया जा सकता है यह यकीन मेंढकों को हो चुका है। कंधा भले ही किसी का मिले मगर लोग जाता ही देते हैं यह बात बस सुना ही था आज रानी देख चुकी है।  यकीन था उसे आसमानों में उड़ने का, मगर आसमानों में कुछ बाज अब अपना घर बन चुके हैं। रानी फिर से एक बार पंखों को काट चुकी है।  रानी फिर से एक बार चलन से पहले,दौड़ने से पहले,डगमगाने से पहले हताश होकर बैठ चुकी है। माँ ने झूठ कहा था कि रानी झुकती नहीं है, कि रानी कभी रुकती नहीं है। अब रानी ठहर चुकी है के,हमेशा हमेशा के लिए खुद में कैद हो चुकी है, अब रानी बिखर चुकी है, थम चुकी हैं। कोई गैर नहीं है उसे तोड़ने वाला कोई अपना ही था जो उसे मार चुका है अंदर ही अंदर उसे खा चुका है कोई बेख्याली बदहवासी उसे खत्म कर चुका है अब रान...

उनके दो नैनन

कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को।  गर वो चूमे मेरा माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। वो रहनुम है मेरा जिसने गुलज़ार किया है मेरे आंगन को। छू कर बदन मेरा, एक नया मंजिल दिया है इस मुसाफ़िर को। हर सांस में अब बस एक नाम है, अगर वो दे -  दे इजाजत तो "जोगन बन फिरूँ" और रेटते रहूं उनके नामो को। कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को। गर वो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। सुनी हूँ हर जर्रे पर खुदा बसता है।  मेरा उनके कदमों में जहां बसता है,हो जाए अगर खुदा भी नाराज तो कोई मलाल नहीं होगा, गर वह कह दे एक बार तो मैं सजदा करूं बस उनको और ढाक लूं अपने इन नैनन को। अगर वो जो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। - राधा माही सिंह 

ठीक हूँ मैं

हाँ ठीक हूँ मैं...!! सौ बात की एक बात हूँ मैं। हाँ ठीक हूँ मैं...!! कुछ हुआ है क्या तुम्हे? नहीं तो!! ठीक हूँ मैं....!!! तो चलो आज कही घूम आते हैं। "जब - जेब टटोली ,मैं तो एक सिक्का मेरे जेब में मुस्कुरा रहा था, जाने कितने वर्षों से रखा था, इसका गुमान दिखा रहा था। बस यह देख झटके से मैं बोली। नहीं - नहीं तुम सब हो आओ। मैं यही ठीक हूँ...!!! खैर गौर तलब यह है, कि सबने साथ छोड़ा है मेरा, मेरी जरूरत पर, मगर अब खुदके भरोसे बैठी हूँ मैं, खुदके साया से डर कर। हाँ..... थोड़ी बदहाली है, मगर ये सफर फिर भी जारी है। थोड़ी सी जिद्दी हूँ मैं। अब अगर कोई पूछले तो मैं मन मार कर कह देती हूँ। हाँ - हाँ बिल्कुल ठीक हूँ मैं..!!! - राधा माही सिंह

गैर

गैर के हाथों में हमने रखी थी अपनी खुशियों की चाबी। अपनों का दिल दुखाकर। कि हमसे ना पूछो कि मेरी ख़ता क्या है? बस पूछो कि मेरी ख़ता क्या-क्या हैं? अपनों को ही हमने ज़माने भर की ठोकरें दी हैं, और यह भी पता चला किसी गैर से ठोकरें खाकर। अगर कश्ती डूब जाती है किसी एक के न होने से, तो बेहतर था कि मैं डूब जाता। कि अब हमको ये जाने सितम रुलाती है रह-रहकर, कि गैरों की हिज्र में रोशनी देने का कारोबार था मेरा। कि एक रोज़ हमने अपने ही हाथों से अपने हिज़्र का दीपक बुझा डाला। ले जाओ मेरी तमन्नाओं को मुझसे दूर, कहीं ये मेरे आखिरी शब्द उसे कोई घाव न दे दें। मसला यह नहीं है कि वो मेरा नहीं हुआ, मसला यह है कि हम अपनों के न होकर कैसे सोच लिए कि कोई गैर मेरा अपना हो सकेगा? - राधा माही सिंह

जाने किसने

जाने किसने इन मर्दों को प्रेम करने का अधिकार दिया! अगर स्त्रियां होतीं तो ग़ज़लें लिखी जातीं बर्बादियों की। जनाजे उठते हर घर से प्रेमियों के। अगर जब लिखती मोहब्बत एक स्त्री तो लिखती खुशियां अपने महबूब की। जाने किसने इन मर्दों को प्रेम करने का अधिकार दिया? अगर जो करतीं ये प्रेम स्त्रियां तो लिखतीं पायल की झंकार और सुनतीं गीत हज़ार। लिखतीं कागज़ पर अपनी भावनाएं, मिटती अपनी जवानी। अगर जो लिखती प्रेम स्त्री तो लिखती अपनी कहानी। जाने किसने इन मर्दों को प्रेम लिखने का अधिकार दिया! जो हर बार लिखते हैं और मिटा देते हैं। जो हर बार लिखते हैं और मिटा देते हैं। - राधा माही सिंह 

आजमाइश

यूं आजमाइश करो ना हमारी हर बात पर, हम पहले से ही आजमाए गए हैं। क्या-क्या बताएं और क्या-क्या छुपाएं तुमसे? जमाने भर की ठोकरें हम खाए हुए हैं। यूं छेड़ो ना कोई राग अब तुम, कि दामन में दाग लगाए हुए हैं। कि यूं चोला ना पहना करो मेरे महबूब का तुम, हम उनसे भी आजमाए गए हैं। बे शर्त जीने का ख़्वाब था आंखों में, और प्रेम का उल्लास लिए दफनाए गए है। यूं ना बर्बाद करो हमको, हम पहले से बरबादी के शहर में खो गए है।  यूं ना ज़लील कर तू मुझे जमाने में,हम पहले से ही खुदको - खुदके नज़रों से गिराए हुए है। तुम क्या जानो मेरी रातों का नींद और सुबह का चैन, हम तो सब कुछ एक शख्स के पूछे गवाए हुए है। - राधा माही सिंह