गम था जाम लगा खुशी थी मुस्कान लगा ना जाने हर पल हर दफा इन होठो को किसी ना किसी का साथ मिला जब बिक रही थी मैं तभी ना जाने कितनों की दाम लगा मगर मेरे होठो को ना आवाज़ मिला
-राधा माही सिंह
कोई मेरी समस्या का निवारण बताइए, बिना खाए कैसे गुजारा करें, कोई उपाय बताइए। खाना बनाते समय गैस कैसे बचाएँ, इसका भी कोई रास्ता समझाइए। हम तो जोड़ लेते थे रूम रेंट और किताबों का हिसाब, अब कैसे दें 400 रुपये गैस के, इस उलझन की कोई गुत्थी सुलझाइए। क्या हम लौट जाएँ बिना मंज़िल पाए घर को, सिर्फ इसलिए कि इस बार न पेपर लीक हुआ, न प्रश्नपत्र में सवाल गलत थे। इस बार तो बस मेरे जीवन की समस्या का कोई हल ही नहीं था — कोई मुझे घर लौटने का कारण बताइए। यह कालाबाज़ारी हम मध्यमवर्गीयों को नोच रही है, कोई इसका भी निवारण बताइए। जब गैस की इतनी किल्लत है, तो कोई समाधान निकालिए। हम खाली पेट कैसे सोएँ, कोई इस समस्या का निवारण बताइए। - राधा माही सिंह
जाकी भजन राम को भावे, जाकी भजन श्याम को भावे। जे मन में मोर मीत बसे, कुहू-कुहू के संगीत बसे। जो मन तोरा, सो मन मोरा, मन में न कोई बैर बसे। जे मन में श्रीराम बसे, जे मन में घनश्याम बसे। जाकी गति सो होवे नाथ, जै लिखी हो दीनानाथ। हमरो हाथ पकड़ लिजो प्रभु, भवसागर से पार की जो प्रभु। बैतरणी से तरी जो प्रभु। डूबत नैया थाम लि जो प्रभु। जस मन व्याकुल होय हमारो तस तोहे गाऊ मोरे नाथ। कर दिजो बस एको उपकर कर दे जो ई भवसागर को पार। जस मन चिंतन मिटी हो हमारा। जे नाम गोसाई सुनी गोहर। जाकी भजन राम को भावे, जाकी भजन श्याम को भावे। जे मन में मोर मीत बसे, कुहू-कुहू के संगीत बसे। राम भी मोरे, श्याम भी मोरे, मोरे मन के प्रीतम दोऊ। एक में जग सारा देखूँ, दोऊ में मोरी दुनिया होऊ। जाकी भजन राम को भावे। जाकी भजन श्याम को भावे।
हाँ मैं ठीक हूँ। शायद यह झूठ है। मेरी आँखों मे डूब रहा सूरज कई दर्दो में ओझल यह बस आँसुओ का बून्द है। हा मैं ठिक हूँ,शायद यह झूठ है। थक सी जाती हूँ एक पल में, मैं परेशानियों से दुर्गम पार करने का हौसला अब झूठ है। है मचलती शाम मेरे धड़कनों में, मैं ठहरी हुई सी दिनकर एक झूठ है। हा मैं ठीक हूँ,शायद यह झूठ है। महज हाल पूछने वाले एक रोज समुन्द्र की लहरों को माप वह रुका हुआ है, चलता है यह झूठ है। कई हस्तियों ने दम तोड़ा है मेरे नजरों के सामने है जिंदा आज भी एक कारवा यह झूठ है। तुम्हारे अपनो की मुस्कान कहीं झूठ है। हर वक़्त,हर लम्हा झूठ है। "और बताओ से लेकर क्या हाल है तक " के जबाबों का सफ़र झूठ है। हाँ मेरे महबूब की टूटी हुई धड़कनों को एक रोज सुनी थी मैं वह सिसक रहा था यह झूठ है। हाँ मैं ठीक हूँ से लेकर सब ठीक हो जाएगा तक कि बुनियाद,शायद कहि झूठ है। कि ये रिश्तों का मंजर एक झूठ है। यहाँ खुशियों की खिल-खिलाती धूप की नई किरणों का गिरना एक झूठ है। शायद इस दुनिया की बुनियादी ढांचे झूट है। हमारा और तुम्हारा मिलना भी एक झूठ है। ...
Comments
Post a Comment