पता नहीं क्यों....???!!
मगर आज पहली बार सब कुछ अपने आँखों के सामने जाते देख मैं रो नहीं रही थी।
आज जो मैं बोली हूँ, वो शायद मैं नहीं थी।
मैं इतना कुछ कैसे बोल सकती हूँ।
मुझमें इतनी हिम्मत कहा से आ रही है?
मैं वो कुछ बोल पा रही हूँ,जो मुझे बुरा लगा था या लगता था।
अब मुझे रोना नहीं आता क्योंकि मैं लड़ना सीख ली हूँ।
जो कल तक किसी कमरे के कौने में दुबक कर रोने लग जाती थी वो आज बेबाकी से अपनी बातों को रख रही थी।
सच कहा गया है, इंसान को किताबें जो चीज़ नहीं सिखा पाता उसे चोट लगने पर समझ आ जाता है।
अब मुझे समझ आ गया है कि मुझे क्या करना है।
मूझे क्या चाहिए।
मैं अब वो ही करूंगी।
और आशा करती हूँ आप भी वो ही करो।
जो आप चाहते हो जो आपका दिल चाहता है।
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