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यादे

यादों के पिटारों से कुछ यादे निकली हूँ। आज तक नई जैसी है। यह देख कर सोच रही हूँ। तो यह यादे कैसी है? यादों के पिटारों से कुछ यादे चुराई हूँ। यह जबकी वह अपना था तो यह चोरी कैसी है? हद की यह बिडम्बनाये थी। जबकी मतलब साफ था सभी बातों का। जहॉ हम थे और हमारी यादों के साये में लिपटी तनहाइयां थी।            -राधा माही सिंह कभी तुम भी साफ कर लिया करो पिता की अलमारियों को देखना कितनी यादे निकलती है तुम्हारी। स्कूल के पहले दिन से लेकर आख़िरी टिका करण तक का यादे जहन में समेटे घूमता है। 18के हो जाने पर सीना तान कर चलता है। तुम्हारी हर खुशी को अपने माथे पर रखता है। पिता है साहब जो फ़क़ीर हो कर भी तुम्हे राजकुमारों,राकुमारी सा रखता है।      -राधा माही सिंह मेरा प्रणाम मेरे पिताजी के साथ-साथ उन तमाम पिता को जिन्होंने निस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों को निभाया है।     #राधा_माही_सिंह     

रिश्ते

रिश्ते बचपन से हमको यही सिखलाया जाता है। रेशम की तरह होते है ये रिश्ते यह बतलाया जाता है। ज़रा सी तना-तानी में टूट जाते है। हर रोज़ की रूसा-फूली में बिखर जाते है। थोड़ी सी ढिल दो तो दूर हो जाते है। सबकी अपनी-अपनी राय थी। सबकी अपनी-अपनी परिभाषये थी। मगर मेरे मन मे उत्पन्न सवालों की एक शृंखला दौड़ रही थी। सवाल यह था, जब ताना-तानी में टूट जाते है रिश्ते तब दादी और दादू के रिश्ते अमेठ क्यों है? जब हर रोज़ अगर रूसा-फूली में अगर बिखर जाते है रिश्ते तो मेरी माँ और पिताजी का रिश्ता आज तक कायम क्यों है?  जब रेशम के कपास की तरह होते है रिश्ते तो एक प्रेमिका और प्रेमी के रिश्ते में दाग क्यों है?         -राधा माही सिंह

त्यौहार।

हाँ मुझे त्यौहारे बहुत पसंद है। क्योंकि इस दिन मेरे पिताजी मेरे पास होते है। मेरी बहन मेरे साथ होती है। उस दिन मेरा घर-घर होता है। मिलकर मेरे घर का दिवारे साथ हस्ता है। हाँ मुझमे अब भी बचपना है। इसलिए ये आँखे हर बार कैलेंडर पर त्यौहारो को ढूंढता है। आज भी मैं उंगलियों पर गिनती हूँ,की कब आएगा त्यौहार? कब आएगा उपहार? उपहार अपनो के साथ होने का। उपहार अपनो के पास होने का। उपहार एक बार मिलकर खिल-खिलाने का। उपहार (आशीर्वादो) को खुद में समेटने का। हाँ आज भी मुझे याद है वो विद्यालय की छुट्टीयो की अर्ज़ियाँ जहाँ लिखा होता था त्यौहार। मुझे याद है आज भी वो दादी की थपकियां जहाँ सहेजा होता था इन त्यौहारो की अनसुनी कहानियाँ। हॉ मुझे इन्तेजार रहता है त्योहारों की। क्योंकि बचपन्न अब भी मिटा नही है। मैं वही हूँ जिसका किस्सा पूरा हुआ नही है।             -राधा माही सिंह 

संकट

अज़ीब धर्म संकट में-मैं पड़ी हूँ मेरे मोल्ह। ना 'आह" कर सकती हूँ। और नाही उफ्फ तक कर सकती हूँ। देखे जा रही हूँ अब-बस देखे जा रही हूँ जब तलक देख सकती हूँ। अपने ही हाथो से भला कौन अपना ही हिज़्र तबाह करता है? मैं तो महज़ राही हूँ। ना ठहराव जरूरी है। और नही ठहर सकती हूँ। अज़ीब बेवशी है मेरे मोल्ह। मन परेशान है,चहरे को अंदाज़ नही। मायुषि है दिल पर मगर इन सासों को इल्म तक नही। ना सुलझी हूँ और नाही दूर तलक उलझी हूँ। समझती हूँ सारी बातों को मगर ना जाने क्यों "बेबाग" बनी बैठी हूँ। शायद कलेज चाहिए अपने आप को बर्बाद करने को। मगर हम तो बगैर कलेज रखे हर ग़म को अपने नाम की हूँ। फ़क़त एक पन्नो पर उतरती हूँ। तो कभी "कलम" से चुभोई जाती हूँ। मैं वो अहसास हूँ। जो बस दिल तक लिप्त कर रह जाती हूँ।                -राधा माही सिंह

जो मेरा है,वो मुझे दे-दे मालिक।

जो मेरा है,वो मुझे दे-दे मालिक। कहाँ मैं तुझ से ज्यादा मांग रही हूँ? जो मेरा है,वो मुझको दे-दे बस इतना गुहार लगा रही हूँ। जो मेरा है,वो मुझे दे-दे मालिक। "तड़पती" है सासे मेरी,आँखे तरशती है। एक दिदार के लिए ना जाने क्यों ये ज़िन्दगी चलती है? मुकम्मल ना सही अधूरी कर दे मैं ना  सही कम से कम उसे पूरी कर दे। मैं राहु बर्बाद मेरे मालिक मेरी मोहब्बत को आबाद कर दे। ज्यादा नही माँगती तुझ से बस जो मेरा है,वो मेरा कर दे।         मेरी ज़िंदगी का सफ़र अब ख़्तम कर दे।       गर जो हुई हो ख़्ता मुझसे तो मुझको माफ़            कर दे। हूँ चली अब सपनो से दूर कही अपनो के तलाश में। मेरी यही इक्षा पूरी कर दे। मैं जहॉ राहु मेरे ेेइश्क को आबाद कर दे। ज्यादा कहाँ माँगी हूँ तुझसे मेरे मालिक जो मेरा है वो मेरे हक में कर दे। जो मेरा है,वो मेरा कर दे।                   -राधा माही सिंह 

मैं

ना जाने किस मोड़ पर आ खड़ी हूँ मैं। जहाँ अपने तो बहुत है,मगर वो अपने नही। गज़ब सी बेगानी लगती है वो गलियां जब कि उन गलियों में मकान है मेरा। हम गुजरे हुए वक़्त की तरह हुए जा रहे है। इन झूठी मुस्कुराहटों के तले खुद को दबाते जा रहे है। इन आँखों मे चमक मेरी आंसुओ की है,मगर हम उसकी क़ीमत भी "खोते" जा रही हूँ मैं। सोचती हूँ शायद खुश हूँ मैं,मगर सच है लोगों को कम खुद को ज्यादा दिखाते जा रही हूँ मैं। हर रोज़ मोमबत्ती की तरह घटते जा रही हूँ मैं।    -राधा माही सिंह 

यात्रा सरकारी बस से।

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यात्रा सरकारी बस से। धकम-धुकी जनहित में जारी। बकम-बकी हरहित में जारी। चचा लड़ेंगे अबकी बेरी! अरे बक बुड़बक "हम चुनाउआ के बात कर रहे है हो।" तुम तो मर्दे "ढकेलले" जा रहे हो। ऐ हो "आगे" चलबै। सूचना सब "लिंग"में जारी यह बस है सहकारी। धकम-धुकी जनहित में जारी सब ही है यहवा के प्रभारी। "सुनलो भैया यह बस है सहकारी।" चोरी-चपारि,घुट-घुट में जारी। हमहू है यहाँ के प्रभारी। बईठल बानी कौन हारी। सकम-सुकिम खूब चलेला,नैन मटका खूब लगेला। मेहर-मरदें खूब लड़ेला। सुना जन लोग "ई बस है सहकारी।" हमहू आज ठनले बानी निंदिया के त्यागले बानी करल जाई जगवारी। धकम-धुकी जनहित में जारी। बकम-बकी हरहित में जारी।  सुनल जाई ऐसो सब के गारा-गारी। जाने ई बार केकर सरकार गिरी? केकर कोइरा के गाज खुली? बक मर्दे गिरी तो गिरी खुली तो खुली रहल जाई अंगाडी। सूचना जनहित में जारी "ई बस है सहकारी।" शब्द :---- चचा:- चाचा, चुनाउआ:- चुनाव, ढकेलले:- जबर्दस्ती, चलबै :- चलना (यह एक मेधली शब्द है), लिंग:- समूह, सहकारी:- सरकारी, यहवा:- यहाँ, प्रभारी:- प्रशासन, चोरी-च...