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साल बदले

साल बदले और उस दरमियान इंसान बदले, वादे टूटे खुदा भी रूठे। पठार की तरह थी हाथो की लकीरें जो पत्थर बन खड़े हुए एक माँ थी जो कभी ना बदली वही रूटिंग था और आज भी रहा है। अब ना जाने खुदा ने उन्हें किस मिटी का मूर्त बना रखा है। दर्दो को चुप-चाप से सहती और किसी से कुछ ना कहती उस दरमियाँ कुछ हो जाए मुझको तो अपने हक का भी दुआ मेरे झोली में दान दे-देती लाखो रुपए को दवाईओ के बाद एक बार नजरो को जरूर है उतरती। अब क्या कहूँ माँ के बारे में जो मुझे शब्द बनाई है उन्हें किस शब्दो से नावजू जो मुझे चलना सिखाई है।     - राधा माही सिंह

अकेली हूँ।

अकेली हूँ इस सफर में अब कोई हम सफर चाहिए। थक चुकी हूँ इस जिंदगी से अब कुछ पल सुकू चाहिए। अपनो के बस्ती बचाते-बचाते खुद की कश्ती डूब गई है बीच मझधार में अब कोई किनारा चाहिए।  अकेली हूँ इस सफर में अब कोई हम सफर चाहिए। भूल गई हूं घर का पता अपना अब मुझको मेंरी इस ख़ता का सजा चाहिए। अकेली हूँ इस सफर में अब कोई हम सफर चाहिए। नही चल सकती इस भीड़ भरी रस्तो में अब मुझको खाली पन चाहिए। अकेली हूँ सफर में अब इस सफर में हम सफर चाहिए।    -राधा माही सिंह

अब और नही।

दर्द है तेज़ अब और नही सहा जाएगा। तुम से दूर अब और नही रहा जाएगा। कम्बख्त मौत क्यों नही आ जाती मुझको अब ना जाने किस कदर से रुसवाई तड़फएगा। मुर्दे भी नही जलेगी मेरी जब तलक वो मुझको हाथ ना लगाएगा। दर्द है तेज़ अब और नही सहा जायगा। यह बरश्ते बादल की घटा कब जाने मेरे आँखों से दूर जाएगा। ज़ख्म है गहरा अब दावा भी ना काम आएगा। और पता नही कब खुदा मुझको अपने दर पर बुलाएगा। दर्द है तेज़ अब और नही सहा जाएगा। हस्ते मुस्कुराते सबो से मिला करती हूँ मगर अब यह सील-सिला यही थम जाएगा। अब शायद फिर से सब कुछ बदल जाएगा। दर्द है तेज़ अब और नही सहा जाएगा।     - राधा माही सिंह

मैं वो स्त्री हूँ।

मैं हर एक वो तन्हाइयों का हिस्सा बन जाती हूँ। मैं वो स्त्री हूँ जो रातो का किस्सा बन जाती हूँ। मैं वह निव्सस्त्र स्त्री हूँ जो हर किसी के बिस्तर में पाती हूँ। सुबह से बैर रखती हूँ रातो से याराना गहरा रखती हूँ। मैं वो तन्हाई हूँ जो खुद में घुट कर रह जाती हूँ। मैं वो स्त्री हूँ जो किसी के बिस्तर पे पाई जाती हूँ। चन्द रुपयों के लिए हाँ, मैं बिक जाती हूँ मगर ईमान नही बेच  खाती हूँ। तन से मन से प्रपंचो से भी तोली जाती हूँ। मैं वो स्त्री हूँ जो गैरो को भी अपनाती हूँ। दागों से भरा है हिज़रा मेरा मगर ममता का प्यार लुटाती हूँ। मैं वो स्त्री हूँ जो दागों से पहचानी जाती हूँ। छली है आँचल मेरा मगर सौ दर्दो को छुपाती हूँ। मैं वी काली रात हूँ जो अमावस के रात नज़र में आती हूँ। बस रात का खेल तमाश बिन बन जाती हूँ। मैं हर एक वो तन्हाइयों का हिस्सा बन जाती हूँ। मैं वो निव्सस्त्र स्त्री हूँ जो हर किसी के बिस्तर का हिस्सा बन जाती हूँ।           -राधा माही सिहं

अधूरा प्यार

बाते इतनी सुनहरी होगी की तुम इसे भुलाना पाओगे। मुलाकाते इतनी गहरी होगी कि तुम हमे छोड़ना पाओगे। तरश जाओगे हमारे दिदार को मगर चाह कर भी मिलना पाओगे। जब मुझ को तुम ठुकरा कर जाओगे। उसी रह पर मुझ को अक्सर ही पाओगे मगर हालत गंभीर होगी वही मैं रहूँगी और वही तुम भी होंगे। गर  वही समा होगी वही दिनकर भी होगा और बार-बार मिलने का सिलसिला  भी होगा। इतर ये भी होगा की रास्ता बदलेंगे हम तुम मगर मंजूरी ना होगा तुम से मिलना गवार ना होगा। सब-सब-सब-सब-सब कुछ वही होगा वही लाल-लाल-लली होगी वही कांबली होगी।  मगर इस बार वो लालम-लाल-लाली मेरे गालो से होकर मेरी माथे का सिंदूर होगा। तड़फ जाओगे हम तुम जब वो मुलाकात हमारी आखरी होगी। रात भी होगा आँखे भी होगी और उनमें ढेरो सवालो से भरी आँसुओ की बरसाते भी होगी। दूर भी होंगे पास भी होंगे इस कस्म-कस में हम तुम हर रोज मरँगे।  तरश जाओगे तुम और तुम्हारी आँखे तुम्हारा दिल भी गुहार लगाएगा।  मेरी आवाज़ सुने तक को भी तड़प जाओगे तुम और लौट कर आओगे और  तुम ही मनाओगे। तब तलक बहुत देर हो जाएगी जब तक तुम वापस को लौट कर आओगे।         ...

रिश्ता

कितना अद्वितीय था ना हमारा तुम्हारा रिश्ता योग्यता तो हम दोनों की ना थी इसे बन्धे और बांधे रखने की मगर इतर रस्ता ना था क्योंकि मेरीरी प्यार में जो गहराई थी। मुझे अस्मिता थी तुझ पर हम तो तुम्हारे देनदार है। संवाद क्या रह गया है अब  हम तो बस तेरे रहमतो का वांछनीय है। (अद्वितीय:- अनोखा।  योग्यता:- क्षमता। इतर:-दूसरा। अस्मिता:-अहंकार। देनदार:- कर्ज़दार। संवाद:- बात जीत। वांछनीय:- चाहने वाले/ चाहने योग्य।)     -राधा माही सिंह

क्या?

क्या कहर बरसाया है तुमने आज तो मेरी साया भी तरश खाया है।  हम पर अरे ज़ालिम दर्द देना ही है। तो सामने से दो ना क्यों बेजान को तड़पाया है तुमने? आज ही तो जन्म ली हूँ ना तो फिर क्यों इस रेस का हिसा बनाया है तुमने। आँखों मे सपनो को सजो कर हाथों में मेहंदी का नाम का बेड़ी लगाया है तुमने। उस बाबा की कन्धों पर कोई भार नही है मगर समाज के डर से ना जाने कितने सालो का प्यार उन्हों ने अपने सिने में दफनाया है । चलो दौड़ गई हूँ मैं भी इस रेस में जरा हमको बताओ तो सही कौन विजय प्राप्ती कर आया है। संस्कार,हया,शर्म और ना जाने क्या-क्या का पाठ हम लड़कियो को पढ़ाया है। दुपटा सरक ना जाए सिने से इस लिए शेप्टी पिन भी लगवाया है। तब भी सवाल है।  मेरा क्या रैप होना अभी तक  बन्द हो पाया है।