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the last words

The last words आख़िरी मतलब की आख़िरी। आख़िरी मतलब जहाँ सब कुुुछ आखिरी हो। मेरा तुमसे यू इस्तीफाकन मिलना,बात करना और फिर खुदको special one समझने लग जाना और बार-बार तुम्हे समझाना शायद अब ये समझना और समझाना आख़िरी होगा मतलब आखिरी। कभी-कभी कुछ आख़िर ज़िंदगी को आसान कर जाते है। मगर कुछ भी हो बात आख़िरी ही होगा। आख़िरी मतलब आख़िरी जहाँ मैं खुल कर लिखूं की मैंने मोहब्बत में नाकामयाबी हासिल की,जहाँ मैं मेरे पन्नो के एक-एक लेख पर आँसूवो को उभार सकू।  आख़िरी जिसे तुम कभी पढ़ ना सको। आखिरी जिसे में लिख ना सकू। आख़िरी जिसे कोई सोच ना सके। आखिरी मतलब आख़िरी। हर बार इश्क़ करने वाले मरे है। इस बार इल्म होगा दुनियाँ को की इश्क़ को मारा गया है। आख़िरी जहाँ मेरी धड़कने तुम तक पहुँच कर भी नही पहुँच सकेगी। आख़िरी जहाँ तुम्हारी सासे दूर हो कर भी मेरे सीने से आ लगेगी। आख़िरी मतलब की आख़िरी। जहाँ जीते जी  एक मोहब्बत करने वाले का अर्थी उठेगी। आख़िरी मतलब-मतलबी हो कर आख़िरी को अनज्म दे जाना ही आख़िरी होगा। आख़िरी जब अंधेरी रातो में लाल आकाश होगा। तब जीवन का सभी सार ख़्तम होगा। आख़िरी का मतलब सिर्फ आख़िरी जहाँ ना हम तुम और ना...

ठीक हूँ मैं

हाँ ठीक हूँ मैं......!!! सौ बात का एक बात हूँ मैं। हाँ ठीक हूँ मैं......!!! कुछ हुआ है तुम्हे, क्या? नही तो!ठीक हूँ मैं.....!!! चलो कही घूम आते है। "जब-जेब टटोला तो एक चवनि शर्मा रही थी।" बस यह देख झट से कहा। नही-नही तुम सब हो आओ! यही ठीक हूँ मैं....!!! सबने सहारा छोड़ दिया आज भी भरोसे बैठी हूँ मैं। बस मन को मार कर कह देती हूँ। हाँ ठीक हूँ मैं....!!!                   -राधा माही सिंंह 

एक बचपन था

एक बचपन था जो दर्द होने पर भी नही रुला पाया था। अब ये जवानी है कि बेबात ही रुलाये जा रही है। एक बचपन का ज़िद था जो बेहद-हदे पार करना सिखाता था। अब ये जवानी का ज़िद है जो जरूरतें पूरी करना सिखाये जा रहा है। एक बचपन था जब घड़ी बांधने की तो इक्षा बहुत थी,मगर समय को देख पाने की इल्म कहाँ था! अब ये जवानी है जहाँ घड़ी हाथो में ना होने पर भी समय के पीछे भागते रहना सिखाये जा रहा है। एक बचपन था,जब जी करता था तब रोलिया करते थे। अब ये जवानी है,जो रातों का इंतेज़ार करवये जा रहा है। गुड़िया, लुका-छुपी,चोर-पुलिस अब इन खेलों में कहाँ जी लगता है?  अब तो ज़िंदगी असल खेल खेलाए जा रही है। की आज बचपन की बहुत याद आ रही है। ये जवानी मुझे हर रोज कतरा-कतरा बाटे जा रही है। एक बचपन था जहाँ माँ की आँचल बेफ़िक्र रहना सिखाता था। अब कहाँ वो बेफ़िक्री का आँचल मिलता है? एक बचपन था जहाँ हर एक दिन में एक सौ साल जी  लिए थे। अब तो यहाँ हर पल ही हम मरते है। जवानी में आकर बचपन खगाल रहे है। आज बड़ी ही तबियत से एक सिक्का आसमानों में उछाल रहे है।                   -राधा माही सिंह...

आओ चलो लौट चलते है।

चलो अब लौट चलते है, काफी थक गए होगे तुम! चलो अब घर को चलते है। आओ चलो अब लौट चलते है। हुआ सो हुआ माफ़ करो इतनी भी क्या नराज़गी भला अपनों से?  "श्याम" चलो अब घर चले। आओ ना मेरे "गिरधारी" घर चले! ऐसी भी क्या नराज़गी जो अपनो से पल-पल दूर करती हो? ज़िंदगी मिली है चलो भरपूर जीते है। हट करना बंद भी करो अब! आओ चलो अब घर चलते है। प्रेम के धागे से बंधा इस दामन को तुम थामे रखो किसी मोड़ पर यह काम देती ही देती है। कि अपनो से बेरूखी सारे सपने तोड़ देते है। चलो ना अब घर चलते है। हुआ जो हुआ उसे भूल समझ कर माफ़ करते है। "मेरी माँ अक्सर कहा करती है, जो माफ़ करते है वही खुदा के समान होते है।" चलो सारे गिले-सिकवे अब दूर करते है। आओ चलो अब लौट चलते है। तुम थक गए होगे! अब घर को चलते है। चलो अब लौट चलते है। चलो अब लौट चलते है।                                 -राधा माही सिंह

हम सब तुम्हारे साथ है।

हम सब तुम्हारे साथ है। यह कह कर ही तो दरवाजे से उस दरवाजे तक ले जाया जाता था। माँ-बाप,भाई-बहन,चाचा-चाची से ले कर ईश्वर तक से पहचान कराई जाती थी। चलते-चलते गिर जाने पर धरती माँ को भी मार खानी पड़ती थी। ममता है इसलिए एक हाथो में मेरी बचपन तो दूसरी हाथो में घर की ज़िम्मेदारीयो उठानी पड़ती थी। है... उम्र नही गुज़रा अभी। मगर सीखी बहुत कुछ हूँ! प्रेम में छिपे स्वार्थ को,अपनों के चहरों में पराए रिश्तेदार को। ना जाने किसने कहा था? कि...........!!!  बिता हुआ वक़्त कभी लौटता नही है। मैं हर रोज़ घड़ियाँ देखा करती हूँ। कल भी 12 बजा उतने ही समय पर था जितना कि बीते हुए कल में बज था। बरहाल माज़रा यह नही था कि उस समय-समय क्या था? माज़रा कुछ ऐसा था कि अपनो का मंजर था। महफिलों में जामो पर जाम लगाई जा रही थी। यारो के साथ कश लगाई गई थी। अब ये वो वक़्त है कि ना वो अपने है और ना वो यार है। बस अब सभी मतलब के तलबगार है। आज खुदको उस हाल में महसूस कर रही हूँ। जब बंद मुठ्ठी करके इस जहाँ में आई थी। तब माँ ने मेरे माथे को चूम कर कहा था। हम सब तुम्हारे साथ है।

हौसले बुलंद है मेरे।

कि हौसले बुलंद है मेरे, कि ना लगाओ मुझ पर तोहमतें। कि बिखरी-बिखरी सी लगती है,अब तो ये काली रातें भी काली घटा सी लगती है। कि हौसले बुलंद है मेरे, कि ना लगाओ मुझ पर तोहमतें। कि पल-पल काया डसती है मुझको अबला होने पर, कि अब तो मेरे अंदर ही  मेरी सांसे हर रोज मरती है। कि हौसले बुलंद हैं मेरे,कि ना लगाओ मुझ पर तोहमतें। कि हर रोज यह सवाल मेरे मन को झकझोर जाता है,कि क्यों है इतनी बंदिशें? कि हौसले बुलंद है मेरे,कि ना लगाओ मुझ पर तोहमतें। कि मुझको "बिरहा" सुना रहा है राग उड़ानों की। कि हौसले बुलंद हैं मेरे,कि ना डालो मुझ पर तोहमतें। कि सफर अधूरी ना रह जाये,कि ना डालो मझ पर समाज की उलझने। कि हौसले बुलंद हैं मेरे,कि ना डालो मुझ पर तोहमतें।

झूठ है।

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हाँ मैं ठीक हूँ। शायद यह झूठ है। मेरी आँखों मे डूब रहा सूरज कई दर्दो में ओझल यह बस आँसुओ का बून्द है।  हा मैं ठिक हूँ,शायद यह झूठ है। थक सी जाती हूँ एक पल में,  मैं परेशानियों से दुर्गम पार करने का हौसला अब झूठ है। है मचलती शाम मेरे धड़कनों में, मैं ठहरी हुई सी दिनकर एक झूठ है। हा मैं ठीक हूँ,शायद यह झूठ है। महज हाल पूछने वाले एक रोज समुन्द्र की लहरों को माप वह रुका हुआ है, चलता है यह झूठ है। कई हस्तियों ने दम तोड़ा है मेरे नजरों के सामने है जिंदा आज भी एक कारवा यह झूठ है। तुम्हारे अपनो की मुस्कान कहीं झूठ है। हर वक़्त,हर लम्हा झूठ है। "और बताओ से लेकर क्या हाल है तक " के जबाबों का सफ़र झूठ है। हाँ मेरे महबूब की टूटी हुई धड़कनों को एक रोज सुनी थी मैं वह सिसक रहा था यह झूठ है। हाँ मैं ठीक हूँ से लेकर सब ठीक हो जाएगा तक कि बुनियाद,शायद कहि झूठ है। कि ये रिश्तों का मंजर एक झूठ है। यहाँ खुशियों की खिल-खिलाती धूप की नई किरणों का गिरना एक झूठ है। शायद इस दुनिया की बुनियादी ढांचे झूट है। हमारा और तुम्हारा मिलना भी एक झूठ है।               ...