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भाग 1

डियर गर्ल्स...!! अपने अस्तित्व बचाने के प्रयास में अपने सपनों के साथ समझौता मत कर देना। आप से अस्तित्व है अस्तित्व से आप शायद हो सकते है। मैने कहा शायद!!!! आप अपने आप के लिए जीवन शुरू कर दो। ये समाज और समाज के ठेकेदार कभी आपको सही नज़रों से देखेंगे ही नहीं क्योंकि इनकी नीयत पहले से ही त्य किया हुआ है। वो आपको किसी वस्तु की तरह देखते है, उनके अनुसार जिसका मोल बाजार में पहले से ही त्य किया जा चुका है । डियर गर्ल्स...!!! आपके आस पास भी कई ऐसी औरतें या कई ऐसे लोग होंगे जो आपको आपको बनने से रोकती है। क्योंकि उनको डर है कि कही आप उनसे बेहतर न बन जाओ। वो डरती है कि आप उनसे आगे न निकल जाओ। वो डरती है कि कही आप उनसे जोड़ा ताकतवर न बन जाओ। डियर गर्ल्स....!! ये बात याद रखना तुम्हे तुम्हारी जंग खुद लड़नी होगी। खुदको कही प्रूफ करने से पहले, खुदके लिए जीना सीखना होगा। तुम्हे जो करना है। जैसे रहना है, तुम रहना। डियर गर्ल्स....!!! अगर तुम्हारे पर्स टांग लेने से तुम चरित्र हीन बन जाती हो तो हाँ हो तुम चरित्र हीन यह उपलब्धि को भी स्वीकार करो मैने किया है। अगर तुम्हें तुम्हारे संघर्षों के कारण जानने के बा...
ठहर कर कुछ देर ही सही, अपने सफ़र को जी लिया कर, ऐ मुसाफ़िर, हर रास्ता ख़ूबसूरत हो, ये ज़रूरी नहीं होता। कुछ देर ही सही, उनकी क़ुर्बत में गुज़ारा करो, हर कोई तुम्हारी तरह ख़ुशनसीब नहीं होता। मैंने कहीं पढ़ा था— आने वाले हर रास्ते का मोड़ एक जैसा नहीं होता। थोड़ा ठहर कर, कुछ देर ही सही, अपने सफ़र को जी लिया कर, ऐ मुसाफ़िर, आने वाला हर रास्ता ख़ूबसूरत नहीं होता। तुम्हें हर बात पर जल्दी है जाने की, तुम्हें क्यों ठहरना नहीं आता?
जाकी भजन राम को भावे, जाकी भजन श्याम को भावे। जे मन में मोर मीत बसे, कुहू-कुहू के संगीत बसे। जो मन तोरा, सो मन मोरा, मन में न कोई बैर बसे। जे मन में श्रीराम बसे, जे मन में घनश्याम बसे। जाकी गति सो होवे नाथ, जै लिखी हो दीनानाथ। हमरो हाथ पकड़ लिजो प्रभु, भवसागर से पार की जो प्रभु। बैतरणी से तरी जो प्रभु। डूबत नैया थाम लि जो प्रभु। जस मन व्याकुल होय हमारो तस तोहे गाऊ मोरे नाथ। कर दिजो बस एको उपकर कर दे जो ई भवसागर को पार। जस मन चिंतन मिटी हो हमारा। जे नाम गोसाई सुनी गोहर। जाकी भजन राम को भावे, जाकी भजन श्याम को भावे। जे मन में मोर मीत बसे, कुहू-कुहू के संगीत बसे। राम भी मोरे, श्याम भी मोरे, मोरे मन के प्रीतम दोऊ। एक में जग सारा देखूँ, दोऊ में मोरी दुनिया होऊ। जाकी भजन राम को भावे। जाकी भजन श्याम को भावे।
प्रेम वैराग्य! वैराग्य स्थिरता ! स्थिरता शीतलता! शीतलता प्यास! प्यास नीर! नीर चंचलता! चंचलता स्वभाव! स्वभाव क्षणिक! क्षणिक मनुष्य! मनुष्य माया! माया प्रेम! अर्थात् जीवन एक चक्र है आप शुरू जहां कही से भी करो अंततः आपको पहचुनां वही है जहाँ से आपने प्रारंभ किया था।
या खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया यह सवाल मेरे मन में अवतार उम्र रहेगी तू रहेगी बेशक मेरे जहां में अब मगर भरोसा है अंदाज अब शायद ही वफा में होगी या खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया यह सवाल तुझे अबता उम्र रहेगी.... मैं करूंगी सजदा तेरा ना मेरे ईमान में कमी होगा.... मगर अब जब भी सजदा करूंगी तो मेरे सवाल में कहीं ना कहीं एतराम होगा हर दफा हर मर्तबा मेरे जहां में सवाल होगा ए खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया... क्यों तूने जरा सा भी मेरे ऊपर दरिया दिल ही नहीं दिखाई क्यों तूने मुझे मेरा पसंदीदा शख्स छीना या खुदा मेरे तूने उसे मेरा क्यों नहीं किया क्या कमी रह गया था मेरे इबादत में मैंने तो उसे खुद नहीं किया फिर तूने उसे क्यों मुझे नहीं दिया या खुदा मेरे किस बात का तूने यह सजा दिया या खुदा मेरे तूने बताइए क्या किया यह जो तुम जुल्म मुझ पर ढा रहे हो यह जो सितम मुझ पर बरसा रहे हो या खुदा मेरे तुम कभी तो मुझ पर तरस खाओ कभी तो मेरे इन दस्तों को पकड़ कर कह दो कि मैं तेरे आगोश में कर रख दूं तू कर थोड़ा सा मुझ पर करम कर तू मुझ पर थोड़ा सा रहें या खुदा मेरे क्या कमी थी मेरे इबादत ...
घर के सुख-चैन को त्याग कर बेटा अफसर बनने चला था। पिता भी खूब इठलाया और पूरे गाँव में ढिंढोरा पीट कर कहा था। " अब बनेगा मेरा बेटा अफसर शहर में जा के।" कई दशक बीत गए, अब बेटा आएगा घर को, जब हांडी ठन-ठनाई, तब बेटा रहा दुबक के। बेटे ने काटी खूब अय्याशी बाप के पैसे पर बढ़-चढ़ के। अब रहा ताकता वो दिन भर अपने घर के अटारी पर चढ़ के। कोई तो हाथ लगे, कोई तो बात बने, कोई तो रह जाए मेरे कारण पछता के। कैसे कोई पंक्षी उड़े उसके घर के अटारी पे आ के?! मैं पंक्षी के पंखों को काटूंगा और वो रह जाएगा छटपटा के। बेटे को कहां भनक था सब देख रहा है ऊपर वाला भी इसको टक लगा के।      - राधा माही सिंह

किल्लत

कोई मेरी समस्या का निवारण बताइए, बिना खाए कैसे गुजारा करें, कोई उपाय बताइए। खाना बनाते समय गैस कैसे बचाएँ, इसका भी कोई रास्ता समझाइए। हम तो जोड़ लेते थे रूम रेंट और किताबों का हिसाब, अब कैसे दें 400 रुपये गैस के, इस उलझन की कोई गुत्थी सुलझाइए। क्या हम लौट जाएँ बिना मंज़िल पाए घर को, सिर्फ इसलिए कि इस बार न पेपर लीक हुआ, न प्रश्नपत्र में सवाल गलत थे। इस बार तो बस मेरे जीवन की समस्या का कोई हल ही नहीं था — कोई मुझे घर लौटने का कारण बताइए। यह कालाबाज़ारी हम मध्यमवर्गीयों को नोच रही है, कोई इसका भी निवारण बताइए। जब गैस की इतनी किल्लत है, तो कोई समाधान निकालिए। हम खाली पेट कैसे सोएँ, कोई इस समस्या का निवारण बताइए। - राधा माही सिंह 

हैपी होली

अब वो स्कूल वाली होली कहाँ रही? अब गुजिया में वो मिठास कहाँ रही? अब गुलाल से ज़्यादा रिश्तों में ही रंग घुलने लगे हैं, अब त्योहारों में वो पहली-सी सौगात कहाँ रही? न वो बेफिक्री की हँसी के ठहाके कहा रही? न वो दोस्त संग रंगों की शरारत भरी वो दिन है और न वो उम्र वाली बात रही। जाने क्यों अब यादों के दर्पण मुझको खुदके ओर खींचते है... सब कुछ तो है.... फिर भी कुछ कमी - सी लगती है, वो बचपन की पिचकारी अंकल आंटी वाली प्रेम की थाली यारो के संग बांटे गए वो रंगों का वो सफेद समय अब वैसे कोई इबारत कहां रही? जीवन ने बहुत से रंग बदले,पर मन को आज भी वही रंग चाहिए जब हाथों में मेरे थे रंग बिरंगे रंग और पिचकारी का वो धार, छत से मारते गुब्बारों का ढेर घर में गूंजती किलकारियों का शोर,मगर अब वो पहले जैसे बात कहा रही? अब पहले जैसी त्यौहार कहां रही?

तू बोले तो

एक तू बोले तो तेरी खुशियों के खातिर हम वैश्या भी बन सकते है। एक तू बोले तो तेरे खातिर इस ज़माने से भी लड़ सकते है। इसका-उसका,किंतु-परंतु सब छोड़ो दे तू बस एक तू बोले तो हम तेरे हो सकते है। हीरा-मोती, महल-अटारी नहीं चाहिए मुझको एक तू बोले तो हम तेरे प्रेम में जोगन हो सकते है। एक तू बोले तो हम तेरी खुशियों के खातिर हम तेरे कदमों में चूम सकते है। एक तू बोले तो तेरे खातिर मीनारों का सुख छोड़ तेरे पास दौड़े आ सकते है। एक तू बोले तेरे खातिर हम वैश्या भी बन सकते है।     - राधा माही सिंह

पूर्व प्रेमीका

मुझे कोई राह बता दो कोई मुझे उस पार करा दो। है उसका जहां ठिकाना मुझे कोई तो उस जगह पहुंचा दो। मैंने उसे मयखाने में भी ढूंढा है, वो वहां भी अब नहीं रहता!  कोई तो मुझे उसके "पूर्व प्रेमीका"  का पता दो। अच्छा छोड़ो...!!? वो कैसा है कम से कम कोई यही बता दो? क्या उसे मेरी बेख्याली नहीं खाती? क्या उसे मेरी याद नहीं आती?  क्या उसे मेरी तन्हाई नज़र नहीं आती? कोई उसे मेरा ही हाल बता दो। मैं ढूंढ रही हूँ "दर- बदर" कोई तो उस तक यह बात पहुँचा दो। वो कहा  है,कैसा है,कोई तो बता दो। - राधा माही सिंह 

रानी

कमरे में अब धूल जम चुका है।  किताबों के जगह कुछ अरमानों ने ले लिया है।  सपना अब दम तोड़ चुका है।  शीत लहर ने अब आस को जगाना छोड़ दिया है।  पिंजरे के ताला अब हमेशा के लिए बंद हो चुका है।  रानी को था यकीन उसका राजकुमार आएगा और उसे इस जहां से बचा कर कहीं दूर तलक ले जाएगा, फिर समझ आया की तालाब से दूर तलक नहीं जाया जा सकता है यह यकीन मेंढकों को हो चुका है। कंधा भले ही किसी का मिले मगर लोग जाता ही देते हैं यह बात बस सुना ही था आज रानी देख चुकी है।  यकीन था उसे आसमानों में उड़ने का, मगर आसमानों में कुछ बाज अब अपना घर बन चुके हैं। रानी फिर से एक बार पंखों को काट चुकी है।  रानी फिर से एक बार चलन से पहले,दौड़ने से पहले,डगमगाने से पहले हताश होकर बैठ चुकी है। माँ ने झूठ कहा था कि रानी झुकती नहीं है, कि रानी कभी रुकती नहीं है। अब रानी ठहर चुकी है के,हमेशा हमेशा के लिए खुद में कैद हो चुकी है, अब रानी बिखर चुकी है, थम चुकी हैं। कोई गैर नहीं है उसे तोड़ने वाला कोई अपना ही था जो उसे मार चुका है अंदर ही अंदर उसे खा चुका है कोई बेख्याली बदहवासी उसे खत्म कर चुका है अब रान...

उनके दो नैनन

कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को।  गर वो चूमे मेरा माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। वो रहनुम है मेरा जिसने गुलज़ार किया है मेरे आंगन को। छू कर बदन मेरा, एक नया मंजिल दिया है इस मुसाफ़िर को। हर सांस में अब बस एक नाम है, अगर वो दे -  दे इजाजत तो "जोगन बन फिरूँ" और रेटते रहूं उनके नामो को। कैनवास पर उकेरूं उनके दो नैनन को। गर वो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। सुनी हूँ हर जर्रे पर खुदा बसता है।  मेरा उनके कदमों में जहां बसता है,हो जाए अगर खुदा भी नाराज तो कोई मलाल नहीं होगा, गर वह कह दे एक बार तो मैं सजदा करूं बस उनको और ढाक लूं अपने इन नैनन को। अगर वो जो चूमे मेरी माथा तो मैं चूमू उनके कदमों को। - राधा माही सिंह 

ठीक हूँ मैं

हाँ ठीक हूँ मैं...!! सौ बात की एक बात हूँ मैं। हाँ ठीक हूँ मैं...!! कुछ हुआ है क्या तुम्हे? नहीं तो!! ठीक हूँ मैं....!!! तो चलो आज कही घूम आते हैं। "जब - जेब टटोली ,मैं तो एक सिक्का मेरे जेब में मुस्कुरा रहा था, जाने कितने वर्षों से रखा था, इसका गुमान दिखा रहा था। बस यह देख झटके से मैं बोली। नहीं - नहीं तुम सब हो आओ। मैं यही ठीक हूँ...!!! खैर गौर तलब यह है, कि सबने साथ छोड़ा है मेरा, मेरी जरूरत पर, मगर अब खुदके भरोसे बैठी हूँ मैं, खुदके साया से डर कर। हाँ..... थोड़ी बदहाली है, मगर ये सफर फिर भी जारी है। थोड़ी सी जिद्दी हूँ मैं। अब अगर कोई पूछले तो मैं मन मार कर कह देती हूँ। हाँ - हाँ बिल्कुल ठीक हूँ मैं..!!! - राधा माही सिंह

गैर

गैर के हाथों में हमने रखी थी अपनी खुशियों की चाबी। अपनों का दिल दुखाकर। कि हमसे ना पूछो कि मेरी ख़ता क्या है? बस पूछो कि मेरी ख़ता क्या-क्या हैं? अपनों को ही हमने ज़माने भर की ठोकरें दी हैं, और यह भी पता चला किसी गैर से ठोकरें खाकर। अगर कश्ती डूब जाती है किसी एक के न होने से, तो बेहतर था कि मैं डूब जाता। कि अब हमको ये जाने सितम रुलाती है रह-रहकर, कि गैरों की हिज्र में रोशनी देने का कारोबार था मेरा। कि एक रोज़ हमने अपने ही हाथों से अपने हिज़्र का दीपक बुझा डाला। ले जाओ मेरी तमन्नाओं को मुझसे दूर, कहीं ये मेरे आखिरी शब्द उसे कोई घाव न दे दें। मसला यह नहीं है कि वो मेरा नहीं हुआ, मसला यह है कि हम अपनों के न होकर कैसे सोच लिए कि कोई गैर मेरा अपना हो सकेगा? - राधा माही सिंह

जाने किसने

जाने किसने इन मर्दों को प्रेम करने का अधिकार दिया! अगर स्त्रियां होतीं तो ग़ज़लें लिखी जातीं बर्बादियों की। जनाजे उठते हर घर से प्रेमियों के। अगर जब लिखती मोहब्बत एक स्त्री तो लिखती खुशियां अपने महबूब की। जाने किसने इन मर्दों को प्रेम करने का अधिकार दिया? अगर जो करतीं ये प्रेम स्त्रियां तो लिखतीं पायल की झंकार और सुनतीं गीत हज़ार। लिखतीं कागज़ पर अपनी भावनाएं, मिटती अपनी जवानी। अगर जो लिखती प्रेम स्त्री तो लिखती अपनी कहानी। जाने किसने इन मर्दों को प्रेम लिखने का अधिकार दिया! जो हर बार लिखते हैं और मिटा देते हैं। जो हर बार लिखते हैं और मिटा देते हैं। - राधा माही सिंह 

आजमाइश

यूं आजमाइश करो ना हमारी हर बात पर, हम पहले से ही आजमाए गए हैं। क्या-क्या बताएं और क्या-क्या छुपाएं तुमसे? जमाने भर की ठोकरें हम खाए हुए हैं। यूं छेड़ो ना कोई राग अब तुम, कि दामन में दाग लगाए हुए हैं। कि यूं चोला ना पहना करो मेरे महबूब का तुम, हम उनसे भी आजमाए गए हैं। बे शर्त जीने का ख़्वाब था आंखों में, और प्रेम का उल्लास लिए दफनाए गए है। यूं ना बर्बाद करो हमको, हम पहले से बरबादी के शहर में खो गए है।  यूं ना ज़लील कर तू मुझे जमाने में,हम पहले से ही खुदको - खुदके नज़रों से गिराए हुए है। तुम क्या जानो मेरी रातों का नींद और सुबह का चैन, हम तो सब कुछ एक शख्स के पूछे गवाए हुए है। - राधा माही सिंह

ऐ ज़िंदगी

ऐ ज़िंदगी, तू मुझे कहीं दूर ले चल, जहाँ बस मैं और तू ही रहें। ले चल मुझे उस फ़िज़ा में, जहाँ किसी की कोई तलब न रहे। गर मैं रहूँ ख़ामोश, तो तुम मेरे शब्दों से समझ जाना, मैं कहूँ बहुत कुछ, तो तु मेरी गहराईयों को छू लेना। ऐ ज़िंदगी, अब हम तुम्हारे ही मोहताज़ हैं, सबने सहारे छिना हैं। तिनके-तिनके के लिए तड़पी हूँ। तू ले चल मुझे वहाँ, जहाँ तेरे आगोश में सर रखकर कुछ पल सुकून का सो सकूँ, और इस जहाँ को एतराज़ भी न हो। जहाँ मैं कह सकूँ, तू सुन सके, मैं रो सकूँ, तू हँसा सके, कोई बंदिश न हो, कोई हमें झुठला न सके। ऐ ज़िंदगी, तू मिलना किसी मुसाफ़िर की तरह, जो मैं कहूँ और तू न जा सके। मैं बाँधू तुझे अपने डोर से, तू सिसक सके, मैं बिलख सकूँ। मैं रूठ सकूँ, तू मना सके, बस यूँ ही चलता रहे ये सिलसिला। तू ले चल मुझे वहाँ, जहाँ कोई और ना जा सके। - राधा माही सिंह

किसी ने पूछा

किसी ने मुझसे पूछा, सुकून क्या है? मैंने कहा, उसका मुस्कुराना। किसी ने मुझसे पूछा, शर्म क्या है? मैंने कहा, उसका मुझसे यूं नज़रों को चुराना। किसी ने मुझसे पूछा, तड़प क्या है? मैंने कहा, उसका मुझसे वादा कर के ना मिलने आना। किसी ने मुझसे पूछा, शिद्दत क्या है? मैंने कहा, मेरा उससे एकतरफा दिल लगाना। किसी ने मुझसे पूछा, मौत क्या है? मैंने कहा, उसका मुझसे रूठ जाना। किसी ने मुझसे पूछा, फिर जज़्बात क्या हैं? मैंने कहा, मेरा उससे लिपटकर रोना और जो कभी पूरे ना हो सकें, उन ख्वाबों को बुनना। -राधा माही सिंह 

क्या इस जहां में

क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां तारे ज़मीन को चूमते होंगे? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां गगन भी अपने मगन में झूमते होंगे? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां बादल आकर मिट्टी की गोद में छुपते होंगे? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं,  जहां पानी की अपनी मिठास होगी? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां नीला अम्बर रहता होगा? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां समंदर में आग नहीं, बल्कि लहरें जलती होंगी? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां पिंजरों से आजाद पक्षी अपने घर को जाते होंगे? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां लोग खुलकर मुस्कुराते होंगे? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां लोग झूठे रिश्ते नहीं बनाते होंगे? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां तारों भरा एक आसमान होगा? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां दीवानों सा एक शायर होगा? क्या इस जहां में कोई ऐसा शहर नहीं, जहां कलमों की अपनी भाषाएं होंगी? - राधा माही सिंह 

आशा

तुम मुझे - मुझ जैसा ही चाहना। ये समुंदर, ये गहरी आंखों का तवजुब ना देना। सुनो, तुम मुझे - मुझ जैसा ही चाहना। मैं जैसी हूँ, जितनी हूँ, तुम्हारी ही हूँ। झील सी चंचल, मचलती हुई रागनी का कोई दावा ना देना। सुनो। तुम मुझे - मुझ जैसा ही चाहना। गर जो मैं हुई परिवर्तित। तो मैं मुझ से नहीं मिल पाऊंगी! मगर मिलना किसे है खुद से? मैं तुम में ही कही खो कर रह जाऊंगी। जब तने- बने से जी भर जाएगा,तो मुझे - मुझ में तुम्हारी तलाश रहेगी, इसलिए तुम मुझसे परिवर्तन का आश ना कर देना। सुनो ना। तुम मुझे - मुझ जैसी ही चाहना। - राधा माही सिंह